ज़िक्रुल्लाह: बंदगी की मेराज

अल्लाह तआला की ज़ात-ए-गिरामी, अपनी खूबियों व कमालात में यकता और बे-मिसाल है, जिसने अदम के पर्दों को चाक करके वजूद की खूबसूरत कहानी रक़म की। ख़लाओं को वुसअत अता…

इख़्लास : आमाल-ए-सालिहा के लिए शर्त

ज़िंदगी के बाम-ए-उरूज पर वही लोग पहुँचते हैं जिनके दिल इख़्लास की रोशनी से मुनव्वर होते हैं। इख़्लास, यानी ख़ालिस नियत, हर नेक अमल की रूह और असास है। जब…

कुफ़्र: अपने हक़ीक़ी मोहसिन की बदतरीन नाशुुक्री

मोहसिन शनासी (उपकार को पहचानना), इंसान के अख़्लाक़ी हुस्न की अलामत है। जो शख़्स अपने मोहसिन की क़द्र करता है, वह इज़्ज़त व शरफ़ का हामिल होता है, और जो…

बिदअत: दीन में तहरीफ़ (बदलाव)

इस्लाम एक मुकम्मल दीन है, जिसे नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़ुरआन करीम और अपनी पाकीज़ा सुन्नत के ज़रिए उम्मत तक पहुँचा दिया है। अब इसमें किसी तरह के…

शिरक: एक ना-क़ाबिले माफ़ी जुर्म

इस्लाम का बुनियादी और सबसे अहम अक़ीदा तौहीद है, यानी अल्लाह तआला की वहदानियत (एक होने) का इक़रार। इसी अक़ीदे की इशाअत व हिफ़ाज़त के लिए तमाम अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम मबऊस…

निफ़ाक़, ईमान के लिए नासूर

इस्लाम में इख़्लास और सच्चाई की बहुत ज़्यादा अहमियत है। ईमान की असल बुनियाद यही है कि दिल, ज़बान और अमल में यकसानीयत (समानता) हो। मगर बाज़ लोग ज़ाहिरी तौर…

तशब्बोह: तहज़ीबी ख़ुदकुशी

तारीख़ गवाह है कि क़ौमें जब अपने फ़िक्री, दीनी और तहज़ीबी तशख़्ख़ुस (पहचान) से दस्तबरदार हो जाती हैं तो उनकी शनाख़्त मिट जाती है और वह किसी ग़ालिब क़ौम के…

इस्लामी मुआशरे के दो बुनियादी उसूल: मसावात, एहतराम इन्सानियत

दुनिया के मुहज़्ज़ब (सभ्य) मुआशरों और तमाम आसमानी मज़ाहिब की समाजी तालीमात का ख़ुलासा, अगर एक लफ़्ज़ में बयान किया जाए तो वह है: इन्सानियत। और इन्सानियत की बुनियाद, दो…

तीन ख़ुशनसीब मुसाफ़िर: आमाल-ए-सालिहा के साये में

दिन की धूप ढल चुकी थी, शाम का आँचल आसमान पर फैलने लगा था। तीन मुसाफ़िरों ने एक पहाड़ के ग़ार (गुफा) में शब-गुज़ारी (रात बिताने) का इरादा किया। जैसे…

इबादत: मक़सद-ए-हयात की तकमील

इबादत महज़ चंद मख़सूस (विशिष्ट) आमाल मुक़र्ररा औक़ात में अल्लाह तआला को याद कर लेना या कुछ मरासिम (रस्मों) की अदायगी का नाम नहीं, बल्कि यह एक मुकम्मल तर्ज़-ए-हयात (जीवन…